दिल्ली में आज से बाहरी राज्यों के इन वाहनों पर प्रतिबन्ध ,जानिये कौन कौन से वाहनों को मिली राहत

राजधानी दिल्ली में लगातार प्रदूषण स्तर बढ़ने से वह ‘सीवियर ‘कैटेगरी में पहुँच चुका है जो कि सरकार के लिए काफी चिन्ताजनक विषय बना हुआ है। अधिकतर ऐसे समय में सरकार GRAP लेवल को बढाती जाती है लेकिन यह एक ऐसा समय आ चुका है जहां एक अहम फैसला लेना बहुत आवश्यक हो जाता है। 16 दिसंबर को दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मंजिंदर सिंह सिरसा ने यह खास ऐलान किया है कि दिल्ली में कोई भी बाहरी राज्यों के वाहन जो कि BS -VI नहीं हैं उनका प्रवेश वर्जित कर दिया है साथ ही दिल्ली की जनता से माफ़ी भी मांगी है आपको बता दें की कुछ समय पहले ‘तंदूर ‘जो कि चपाती बनाने में उपयोग लिया जाता है वह भी पूर्ण रूप से बैन कर दिया था आइये जानते है कि वाहनों से दिल्ली में क्यों बढ़ रहा है प्रदूषण ?

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वाहनों से कैसे होता है प्रदूषण ?

वाहनों से प्रदूषण बढ़ने का मुख्य कारण ईंधन के जलने के दौरान निकलने वाली हानिकारक गैसें और कण होते हैं। पेट्रोल और डीज़ल से चलने वाले वाहन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और पार्टिकुलेट मैटर (PM) जैसे प्रदूषक उत्सर्जित करते हैं, जो हवा की गुणवत्ता को खराब करते हैं। पुराने या सही तरीके से मेंटेन न किए गए वाहन अधिक धुआँ छोड़ते हैं, जिससे शहरी क्षेत्रों में स्मॉग और सांस से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ती हैं। ट्रैफिक जाम में वाहनों का लंबे समय तक इंजन चालू रहना भी प्रदूषण को और बढ़ा देता है। इसके अलावा, वाहनों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें जलवायु परिवर्तन में योगदान देती हैं, जिससे तापमान बढ़ना और पर्यावरण असंतुलन जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं।जिससे कि AQI का स्तर दिन प्रति दिन ख़राब होता जाता है।

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वाहनों से प्रदूषण बढ़ने की प्रक्रिया को विस्तार से समझें तो सबसे पहले ईंधन दहन को देखना जरूरी है। जब पेट्रोल, डीज़ल या सीएनजी जैसे ईंधन इंजन में जलते हैं, तो उनके साथ कई जहरीली गैसें निकलती हैं। इनमें कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) होती है, जो खून में ऑक्सीजन की मात्रा कम कर देती है, नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) होती है, जो ओज़ोन और स्मॉग बनाने में मदद करती है, और सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) व पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10) होते हैं, जो फेफड़ों और हृदय से जुड़ी बीमारियों का कारण बनते हैं।

शहरों में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ने, ट्रैफिक जाम में लंबे समय तक इंजन चालू रहने और बार-बार ब्रेक-एक्सीलेरेटर के इस्तेमाल से ईंधन की खपत और उत्सर्जन दोनों बढ़ जाते हैं। पुराने वाहनों में आधुनिक एमिशन कंट्रोल तकनीक नहीं होती, इसलिए वे ज्यादा धुआँ और काले कण छोड़ते हैं। इसके अलावा, टायर और ब्रेक के घिसने से भी सूक्ष्म कण निकलते हैं, जो हवा में मिलकर प्रदूषण को और गंभीर बनाते हैं।

वाहनों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है, जो ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है। इसके प्रभाव से तापमान में वृद्धि, मौसम चक्र में बदलाव और पर्यावरण असंतुलन जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं। इस तरह, वाहनों से होने वाला प्रदूषण न केवल हवा की गुणवत्ता को खराब करता है, बल्कि मानव स्वास्थ्य, पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

वाहनों का पॉलुशन जाँच जरुरी हो

दिल्ली में वाहनों के प्रदूषण की जाँच को सख्ती से लागू करने के पीछे एक स्पष्ट और आवश्यक सिद्धांत है। राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर अक्सर खतरनाक श्रेणी में पहुँच जाता है, जिसमें वाहनों से निकलने वाला धुआँ एक बड़ा कारण माना जाता है। इसी वजह से सरकार और परिवहन विभाग द्वारा PUC (Pollution Under Control) जाँच को अनिवार्य और कड़ाई से लागू किया गया है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि समय-समय पर वाहनों की प्रदूषण जाँच की जाए, तो खराब इंजन, गलत फ्यूल मिक्स और मेंटेनेंस की कमी से होने वाले अतिरिक्त धुएँ पर नियंत्रण पाया जा सकता है। सख्त जाँच और भारी जुर्माने का उद्देश्य वाहन चालकों को जिम्मेदार बनाना है, ताकि वे अपने वाहन सही स्थिति में रखें। इससे न केवल हवा की गुणवत्ता में सुधार होता है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य, खासकर बच्चों और बुजुर्गों को होने वाली सांस संबंधी बीमारियों से भी बचाव किया जा सकता है।

 

 

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